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देहरादून के ईस्ट हॉफ टाउन में बड़ा भूमि घोटाला? प्रतिबंधित खसरा नंबरों की रजिस्ट्रियों पर उठे गंभीर सवाल

देहरादून: राजधानी के विकासखंड सहसपुर के अंतर्गत आने वाले ईस्ट हॉफ टाउन इलाके में जमीनों की खरीद-फरोख्त को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि गोल्डन फॉरेस्ट और राज्य सरकार से संबंधित प्रतिबंधित व विवादित भूमि के कई खसरा नंबरों पर कथित रूप से फर्जीवाड़ा कर अनियमित तरीके से रजिस्ट्रियां की जा रही हैं। इस मामले के सामने आने के बाद स्थानीय प्रशासन और रजिस्ट्री विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

इन खसरा नंबरों पर लगे गंभीर आरोप

मिली जानकारी के मुताबिक, यह पूरा मामला मुख्य रूप से खसरा नंबर 847,848, 858, 859,919,922 और 870 से जुड़ा हुआ है। स्थानीय लोगों और सूत्रों का दावा है कि इन खसरा नंबरों की जमीनों की खरीद-बिक्री और रजिस्ट्री पर कानूनी रोक या प्रतिबंध लागू है। इसके बावजूद कथित तौर पर प्रशासनिक अधिकारियों और भू-माफियाओं की सांठगांठ से इन जमीनों की धड़ल्ले से रजिस्ट्रियां कराई जा रही हैं। भूमिया ₹5000 गज के हिसाब से कागज खरीद रहे हैं और फिर उन कागज़ो के आधार पर सरकारी नंबरों की जमीनों को दिखाकर लोगों से लाखों की ठगी कर रहे हैं।

कब्जे किसी के, कागजात किसी और के नाम

मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि धरातल पर जमीन पर कब्जा किसी अन्य व्यक्ति का है, जबकि कागजों में उस जमीन के दस्तावेज किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर दिखाए जा रहे हैं। इस विरोधाभास के कारण क्षेत्र में तनाव की स्थिति है और लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि जमीन का वास्तविक मालिकाना हक किसके पास है। सवाल यह भी उठ रहा है कि रजिस्ट्री से पहले संबंधित दस्तावेजों और खतौनी का सत्यापन किस स्तर पर किया गया?

खरीदारों को विवादों में फंसाने का खेल

आरोप है कि क्षेत्र में सक्रिय भू-माफिया सीधे-साधे लोगों को विवादित और प्रतिबंधित जमीनें बेचकर भारी मुनाफा कमा रहे हैं। जमीन बेचने के बाद खरीदारों को कानूनी पचड़ों और विवादों के हवाले छोड़ दिया जाता है। बाद में जब खरीदार जमीन पर निर्माण या दाखिल- खारिज के लिए जाते हैं, तब उन्हें धोखाधड़ी का पता चलता है।

उठ रहे हैं ये बड़े सवाल:

प्रतिबंध के बावजूद: जब इन खसरा नंबरों पर रजिस्ट्री पर रोक थी, तो उप-निबंधक (रजिस्ट्रार) कार्यालय से इनकी रजिस्ट्री कैसे संभव हुई?
– राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर: क्या राजस्व रिकॉर्ड और खतौनी में जानबूझकर हेरफेर कर प्रतिबंधित श्रेणी की भूमि को सामान्य दिखाया गया?
– प्रशासनिक लापरवाही: जमीनों की जमीनी हकीकत और कब्जों की जांच किए बिना रजिस्ट्रियां होने देना किसकी लापरवाही या मिलीभगत है?

उच्चस्तरीय जांच की मांग

इस मामले के उजागर होने के बाद अब स्थानीय लोगों ने शासन-प्रशासन से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि संबंधित खसरा नंबरों के राजस्व रिकॉर्ड, रजिस्ट्री दस्तावेजों और मौके पर वास्तविक कब्जे की गहनता से जांच की जानी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके और आम जनता को इस कथित धोखाधड़ी से बचाया जा सके।

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